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20 जन॰ 2010

अश्कों के मायने अलग होते !!!

Neeraj Kumar
रहमोकरम पे आपके/
हमने गुजारें हों/
कुछ पल अगर,
यूँ ना समझना/
सुकून से जीकर/
मर सकें हैं हम।

टूटते रहे थे/
मेरे आसमान के तारे/
एक-एक कर,
रौशनी की लकीर/
दीखती न थी,
बढ़ता जाता था/
अंधेरे का डर।

अजीबोगरीब हुए हादशे/
जिंदगी में हमारे/
यकीन ना होगा,
तबियत से उजाडा/
अपनों ने आशियाँ/
मिलकर जो था बसाया।

रातें होती थीं काली/
दिन भी रौशन ना थे,
शाम-ओ-सहर/
पुकारते रौशनी को/
खड़े रहते थे/
दरवाज़ा खोलकर।

हिम्मत जो की होती/
जिगर फौलाद करने की,
रिश्तों को समझते/
काश समय रहते,
आज अश्कों के हमारे/
मायने अलग होते।

7 जन॰ 2010

बने एक सवेरा

दूर हटे बीते साल का अँधेरा,
सबके लिए बने एक सवेरा!
फूलों की खूसबू मिले हर इंसान को,
खूसगवार ज़िन्दगी मिले हर इंसान को!
आतंक की अर्थी उठे इस देश में,
हम दिखें हमेशा भारतीयेता के देश में
नफरत खाक में मिले
हर जगह प्यार के फूल खिले!
हम हर इंसान को,
इंसानियत का पाठ पढ़ायें!
चोरकर हम दुश्मनी को
हम भारतीय को गले लगायें!
भूल जाएँ हम गिले-शिकवे की रात को
दिल में बिठाएं हम गले मिलने की बात को!
मिट जाए बीते साल की निराशा,
हर इंसान को मिले आशा ही आशा!

5 जन॰ 2010

बनो मेरी दुल्हन...

कभी मेरे दिल में ठहर के तो देखो
हजारों हैं यादें, गुजर के तो देखो।

बनाया है ये घर तुम्हारे लिए ही,
किसी सहर यहाँ पे नहा के तो देखो।

मचलती हैं बाहें कहें तुमको कैसे
आगोश में मेरे सिहर के तो देखो।

सजाया है कमरा गुलाबों से ऐसे
बनो मेरी दुल्हन बिखर के तो देखो।

मुहब्बत ने तेरे बनाया है 'नीरज'
कभी इन आंखों में सँवर के तो देखो।