नीरज-हृदय
शब्दों को तोड़कर, हेर-फेर कर, जो लिख जाता हूँ- कहता हूँ, है कविता...
01 March 2012
09 January 2012
घड़ा टूटा हुआ...
मैं चाहता हूँ
मिल जाना मिट्टी में,
लेकिन आह!
मैं मिल नहीं पाता
क्यूंकि
मैं साधारण मिट्टी नहीं
एक घड़ा हूँ,
टूटा हुआ घड़ा...
मेरा अस्तित्व
है नहीं
और है भी...
मैं सुकून हूँ
उस कुम्हार का
जिसने बनाया था मुझे
जिसने पकाया था मुझे
थामे रखने को पानी
और
बखूबी दिया अंजाम मैंने
अपने अंत तक
उसके मकसद को...
उस कुम्हार का
जिसने बनाया था मुझे
जिसने पकाया था मुझे
थामे रखने को पानी
और
बखूबी दिया अंजाम मैंने
अपने अंत तक
उसके मकसद को...
23 December 2011
हाल-ए-दिल
नन्हा-सा दिया हूँ
बुझ भी जाऊँ तो क्या,
परवाने की परवाह थी
अंधेरे को क्या?
रास्ते पे होते हैं यूँ
बिखरे पत्थर कितने,
गिनता है राही गुजरता
कभी उनको क्या?
सैलाबों मे जिसके
साहिल नहीं डूबा करता,
अदना आँसू वो,
गिर भी जाऊँ तो क्या?
लब पे लिए मुस्कान
आँखों में दर्द छुपा रखा है,
तन्हा हूँ, घायल हूँ
हाल-ए-दिल बताऊँ तो क्या?
बुझ भी जाऊँ तो क्या,
परवाने की परवाह थी
अंधेरे को क्या?
रास्ते पे होते हैं यूँ
बिखरे पत्थर कितने,
गिनता है राही गुजरता
कभी उनको क्या?
सैलाबों मे जिसके
साहिल नहीं डूबा करता,
अदना आँसू वो,
गिर भी जाऊँ तो क्या?
लब पे लिए मुस्कान
आँखों में दर्द छुपा रखा है,
तन्हा हूँ, घायल हूँ
हाल-ए-दिल बताऊँ तो क्या?
16 December 2011
जिंदगी का गीत
आदमी हूँ आदमी से प्यार करना चाहता हूँ,
जाम ये मैं जिंदगी के नाम पीना चाहता हूँ।
हो मुबारक मंज़िलें वो चाह जिसकी आपको है
मैं सड़क पे ठोकरों मे खेल पाना चाहता हूँ।
मैं हमेशा अजनबी था कायदों से इस जहां के
रोज जीना, रोज मरना, रोज जीना चाहता हूँ।
लोग कहने के लिए तो प्यार करते है खुदा से
मैं दिलों मे बस खुदा को देख पाना चाहता हूँ।
कत्ल कर दो आप मेरा या सजा दो मौशिकी की
मैं हमेशा जिंदगी के गीत गाना चाहता हूँ।
3MMRREK7W394
जाम ये मैं जिंदगी के नाम पीना चाहता हूँ।
हो मुबारक मंज़िलें वो चाह जिसकी आपको है
मैं सड़क पे ठोकरों मे खेल पाना चाहता हूँ।
मैं हमेशा अजनबी था कायदों से इस जहां के
रोज जीना, रोज मरना, रोज जीना चाहता हूँ।
लोग कहने के लिए तो प्यार करते है खुदा से
मैं दिलों मे बस खुदा को देख पाना चाहता हूँ।
कत्ल कर दो आप मेरा या सजा दो मौशिकी की
मैं हमेशा जिंदगी के गीत गाना चाहता हूँ।
3MMRREK7W394
08 December 2011
जिंदगी-क्षितिज
जहां मिल रहे हैं
आसमान-से ख़्वाब
और
हकीकत की जमीन...
ख्वाब
जो उड़ते रहते हैं
पर लगाकर उम्मीदों के
बेसिरपैर
और
हकीकत
पसरी हुई है
असीम रेगिस्तान-सी
तड़पाती हुई...
जो उड़ते रहते हैं
आसमान मे ऊंचे
उन्हें
क्षितिज दिखता नहीं
और
जो बढ़ते रहते हैं
जमीन पर डरते हुए
उन्हें
क्षितिज मिलता नहीं...
03 December 2011
कविता...
हेर-फेर कर
जो लिख जाता हूँ
कहता हूँ, है कविता...
हृदय में दबी हुई
प्रतिशोध की ज्वाला
बंधनों को झटककर
जब चीख उठती है
कहता हूँ, है कविता...
जिन्दगी की दौड़ में
आगे- पीछे होते
ठिठककर रुक जाता हूँ
बनाता हूँ बहाने
कहता हूँ, है कविता...
मासूम ख्वाबों की
सुनसान कब्र पे उगी
अनजान घासों को
सींचता हूँ अश्कों से
कहता हूँ, है कविता...
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