चमड़ी-दमडी का फर्क, परिचय बनता जाय।
लाल नलिका धमनी, हरी शिरा कहलाय
<6>
साजन सावन आ गया, हरित ललित प्रभाव।
हरि बिन हरा ना होगा, हरिन-ह्रदय का भाव॥
चमड़ी-दमडी का फर्क, परिचय बनता जाय।
लाल नलिका धमनी, हरी शिरा कहलाय
<6>
साजन सावन आ गया, हरित ललित प्रभाव।
हरि बिन हरा ना होगा, हरिन-ह्रदय का भाव॥
By: knkayastha
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खुदी को किया बुलंद हिम्मत से अपने,
दुश्मन थे जो सर झुकाने लगे हैं॥
गलियों से आजकल गुजरने पर मेरे
झरोखे भी अब मुस्काने लगे हैं॥
सड़कों पे अजनबी जितने थे चेहरे
आसपास महफ़िल सजाने लगे हैं॥
जमाने का ऐसा हो गया है रिवाज,
उन्नति को अपना बताने लगे हैं॥
जिंदगी को बाहों में भर लिया मैंने,
ख्वाबों में तारे जगमगाने लगे हैं॥
मुझे है इंतज़ार पैगाम का तेरे,
राहों में पलकें बिछाने लगे हैं॥
मुहब्बत की दुनिया बनाई थी हमने,
ख्यालों से उसको सजाने लगे हैं॥
इन्तहां हो गई जब इम्तहान की मेरे,
बाँहों में तुझे तब पाने लगे हैं॥
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वो साहिल पे गाने वाले क्या हुए!
वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए!
वो सुबह आते-आते रह गई कहाँ
जो काफिले थे आने वाले क्या हुए!
मैं जिन की राह देखता हूँ रात भर
वो रौशनी दिखने वाले क्या हुए!
वो कौन लोग हैं मेरे इधर-उधर
वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए!
इमारतें तो जलकर राख हो गई
इमारतें बनाने वाले क्या हुए!
ये आप-हम बोझ हैं ज़मीं के
ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए!

By: knkayastha
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कुछ कदम ऐसे मिले
जो अर्सों से दूर थे!
कुछ बात ऐसी सुनी
जो अर्सों से गुमशुदा थी!
पुराने दोस्त लौट आए!
पुरानी यादें लौट आई!
ढूंढ रहे थे जिसे हम
वो अब हैं मिल पाये!
खुश हुए हैं आपसे मिलकर
खुश हो जाइये आप भी!
मत सोचिये अब मुझे
और कुछ कीजिये भी!


By: knkayastha
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लगी पलंग टटोलने, व्याकुल होकर आज।
उठी तुंरत विचारने, रात्री के परिहास॥
कहीं मतंग तरंग में, निकली ऐसी बात।
लगी पिया के ह्रदय, गहरी कोई फांस॥
चली भ्रमित देखने, रुकी हुई है साँस।
लगी भयभीता फिरने, बुझी हुई है आस॥
तभी किचन की ओर से, आई एक आवाज।
बर्तन सारे साफ़ हैं, जली हुई है आंच॥
By: knkayastha
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अजीब-सा रास्ता
भूली हुई राह
एक और रात
लो फिर आ गई!
भुला-भुला-सा प्यार
भूली-भूली-सी जगह
एक और रात
लो फिर आ गई!
मुझे समझ में नहीं आया
कहानी की क्या विषय थी
एक और रात
लो फिर आ गई!
चेहरे पर उदासी
मन में क्या बात थी
एक और रात
लो फिर आ गई!
मन प्रसन्न था
बात खुशी से होने लगी
एक और रात
लो फिर आ गई!
एक रात जागे थे
एक दिन सोये थे
एक और रात
लो फिर आ गई!
प्यारा-प्यारा-सा स्वप्न
प्यारी-प्यारी-सी बात
एक और रात
लो फिर आ गई!
उनसे मैं खुश था
वो मुझसे नाराज़ थे
एक और रात
लो फिर आ गई!
इरादे अच्छे होते होते हैं
इरादे बुरे होते हैं
पर क्यों होते हैं वे अच्छे या बुरे?
दिल तो बुरा नहीं होता,
दिल भी बुरा नहीं होता
और इनमें ही बनते हैं इरादे!
फिर क्यों हो जाते हैं
इराद अच्छे या बुरे?
समाज के मानक पर जो
खरा वो अच्छे,
समाज के मानक पर जो खोता वो बुरा!
कौन बनाता है समाज का मानक?
व्यक्ति का अनुभव या
दबंगों की सहूलियत?
या फिर दोनों का सम्मिश्रण?
पर रुकते नहीं हैं इरादे
चाहे बुरा कहो या भला,
क्योंकि इरादे न अच्छे होते हैं,
न बुरे होते हैं
वे तो हैं
ज़िन्दगी के प्रवाह के अनुभव
ज़िन्दगी की मज़बूरी या
प्रर्वच्नाओं के प्रतिफल!
वे उठते हैं
वर्तमान को चुनौती देने
इतिहास को बदलने
और भविष्य का श्रीजन करने
चाहे अच्छें हो या बुरे
उनका होना जरुरी है
क्योंकि तभी चलता है
विकास का क्रम!
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की जगह रखना!
जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना!
मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए
अपने दिल में कहीं खुदा रखना!
मिलना-जुलना जहाँ जरुरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना!
उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना!
By: V. VIVEK
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