गुरुवार, ३ दिसम्बर २००९

दोहा

<1>
वचन गुरु पिता के हैं, लगते बड़े कठोर।
निज स्वारथ साधन हेतु, पकडे रहते डोर॥

<2>
काली-काली भैंस को, देख मुझे कुछ होय।
रंग-भेद के कारण न, गौ माता कहलाय॥

<3>
उतने कदम बढाइये, जितनी जरुरत होय।
जंगल सागर ना बचे, धरती मरू बन जाय॥

<4>
रामराज की चाह में, जनता हुई शहीद।
राजनीति के दाँव ने, बाटें संत-फ़कीर

<5>

चमड़ी-दमडी का फर्क, परिचय बनता जाय।

लाल नलिका धमनी, हरी शिरा कहलाय

<6>

साजन सावन आ गया, हरित ललित प्रभाव।

हरि बिन हरा ना होगा, हरिन-ह्रदय का भाव॥

शनिवार, २१ नवम्बर २००९

इन्तहां इम्तहान की

खुदी को किया बुलंद हिम्मत से अपने,
दुश्मन थे जो सर झुकाने लगे हैं॥
गलियों से आजकल गुजरने पर मेरे
झरोखे भी अब मुस्काने लगे हैं॥
सड़कों पे अजनबी जितने थे चेहरे
आसपास महफ़िल सजाने लगे हैं॥
जमाने का ऐसा हो गया है रिवाज,
उन्नति को अपना बताने लगे हैं॥
जिंदगी को बाहों में भर लिया मैंने,
ख्वाबों में तारे जगमगाने लगे हैं॥
मुझे है इंतज़ार पैगाम का तेरे,
राहों में पलकें बिछाने लगे हैं॥
मुहब्बत की दुनिया बनाई थी हमने,
ख्यालों से उसको सजाने लगे हैं॥
इन्तहां हो गई जब इम्तहान की मेरे,
बाँहों में तुझे तब पाने लगे हैं॥

बुधवार, १८ नवम्बर २००९

ग़ज़ल:- (साभार:- हिंदुस्तान अखबार)

वो साहिल पे गाने वाले क्या हुए!
वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए!

वो सुबह आते-आते रह गई कहाँ
जो काफिले थे आने वाले क्या हुए!

मैं जिन की राह देखता हूँ रात भर
वो रौशनी दिखने वाले क्या हुए!

वो कौन लोग हैं मेरे इधर-उधर
वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए!

इमारतें तो जलकर राख हो गई
इमारतें बनाने वाले क्या हुए!

ये आप-हम बोझ हैं ज़मीं के
ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए!

सोमवार, १६ नवम्बर २००९

बेबस आह!


अधखिली कली वो जूही

की मेरे बचपन की माली थी,

मेरे सपनो की गलियों में

फिरती बनी मतवाली थी।



चंचल चितवन, गोरी शबनम

सोम-सुधा की प्याली थी,

वह वसंत के दिन में

मेरे जीवन की हरियाली थी।



जब यौवन सावन घिर आया

दूर खड़ी भरमाती थी,

गुमसुम गुपचुप नयनों से

उसकी छुअन सहलाती थी।



पाक जिस्म मैं, मन से भोला

वो मासूम हिय की वाणी थी,

काम-क्रोध-मद में भूला

वो निच्छल प्रेम दीवानी थी।



गया वसंत ना आएगा

हुई मुझसे नादानी थी,

मासूम प्यार मैंने था खोया

करून कथा पुरानी थी।

शुक्रवार, १३ नवम्बर २००९

आपसे मिलकर

कुछ कदम ऐसे मिले
जो अर्सों से दूर थे!
कुछ बात ऐसी सुनी
जो अर्सों से गुमशुदा थी!

पुराने दोस्त लौट आए!
पुरानी यादें लौट आई!
ढूंढ रहे थे जिसे हम
वो अब हैं मिल पाये!

खुश हुए हैं आपसे मिलकर
खुश हो जाइये आप भी!
मत सोचिये अब मुझे
और कुछ कीजिये भी!

बुधवार, ११ नवम्बर २००९

चौराहा पे राही


हर वक़्त ख़ुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूँ,

टार्च पास नहीं, अंधेरे में भटक जाता हूँ।



जो सीधे रास्ते चले थे आगे निकल गए,

हम नए राह की खोज में पिछरते चले गए।


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वक्त का तकाजा समझा मैं ठोकरों के बाद

लहूलुहान थी शख्सियत, खुले थे मेरे हाथ।



गर चाहते हो तुम, दामन भरा हो खुशियों से,

करो मेहनत, गुजरो सदा पुरानी राहों से।



कतरा-कतरा जिंदगी, जिहाद का ऐलान है,

हरेक रास्ता हिम्मती के, पाँव का निशान है।



उस आदमी की मिटटी होती है कुछ खास ही,

ख़ुद बनाता है जो अपनी राह भी, मुकाम भी।

शुक्रवार, ३० अक्तूबर २००९

फांस



लगी पलंग टटोलने, व्याकुल होकर आज।


उठी तुंरत विचारने, रात्री के परिहास॥



कहीं मतंग तरंग में, निकली ऐसी बात।


लगी पिया के ह्रदय, गहरी कोई फांस॥



चली भ्रमित देखने, रुकी हुई है साँस।


लगी भयभीता फिरने, बुझी हुई है आस॥



तभी किचन की ओर से, आई एक आवाज।


बर्तन सारे साफ़ हैं, जली हुई है आंच॥

गुरुवार, २९ अक्तूबर २००९

एक और रात.....

अजीब-सा रास्ता
भूली हुई राह
एक और रात
लो फिर आ गई!

भुला-भुला-सा प्यार
भूली-भूली-सी जगह
एक और रात
लो फिर आ गई!

मुझे समझ में नहीं आया
कहानी की क्या विषय थी
एक और रात
लो फिर आ गई!

चेहरे पर उदासी
मन में क्या बात थी
एक और रात
लो फिर आ गई!

मन प्रसन्न था
बात खुशी से होने लगी
एक और रात
लो फिर आ गई!

एक रात जागे थे
एक दिन सोये थे
एक और रात
लो फिर आ गई!

प्यारा-प्यारा-सा स्वप्न
प्यारी-प्यारी-सी बात
एक और रात
लो फिर आ गई!

उनसे मैं खुश था
वो मुझसे नाराज़ थे
एक और रात
लो फिर आ गई!

सोमवार, १९ अक्तूबर २००९

मेरी कुछ बातें

मैं सोचता हूँ

हर दिन

कुछ करुँ नया!

सोचते-सोचते

कुछ मिला

और वो दिन

बीत गया!


मेरा सवेरा

होता था

कुछ ख़ास

लम्हों के साथ!

बीतती थी

मेरी रात

एक नए

सोच के साथ!


दीवार बनकर

उदासी मेरे

दिल पर!

क्या करुँ,

क्या करुँ

बचकर रहता हूँ

इससे मैं घबराकर!


मैं अपनी

दिली इच्छा से

बैठता हूँ

कोई नया काम करने!

लेकिन कुछ लोग

ऐसे मिल जाते हैं

जो लग जाते हैं

उसे रोकने!


मैं अपनी

उदासी भरी बात

आज आप लोगों से

व्यक्त कर रहा हूँ!

आप इसे

समझ सकतें हैं

तो समझें

नहीं तो मैं

कुछ भी नहीं

कह रहा हूँ!


कोई भी काम

मैं ठीक से

नहीं कर पाटा

मेरे मन में

घबराहट गूंजती है

जिसे मैं

कह नहीं पाटा!


"मेरी कुछ बातें"

किसी की दिलों में

नहीं जाती!

सब अपने

रहते हैं मग्न

और मेरी बात

समझ में नहीं आती!

बुधवार, १४ अक्तूबर २००९

इरादे

इरादे अच्छे होते होते हैं
इरादे बुरे होते हैं
पर क्यों होते हैं वे अच्छे या बुरे?
दिल तो बुरा नहीं होता,
दिल भी बुरा नहीं होता
और इनमें ही बनते हैं इरादे!
फिर क्यों हो जाते हैं
इराद अच्छे या बुरे?
समाज के मानक पर जो
खरा वो अच्छे,
समाज के मानक पर जो खोता वो बुरा!
कौन बनाता है समाज का मानक?
व्यक्ति का अनुभव या
दबंगों की सहूलियत?
या फिर दोनों का सम्मिश्रण?
पर रुकते नहीं हैं इरादे
चाहे बुरा कहो या भला,
क्योंकि इरादे न अच्छे होते हैं,
न बुरे होते हैं
वे तो हैं

ज़िन्दगी के प्रवाह के अनुभव
ज़िन्दगी की मज़बूरी या
प्रर्वच्नाओं के प्रतिफल!
वे उठते हैं
वर्तमान को चुनौती देने
इतिहास को बदलने
और भविष्य का श्रीजन करने
चाहे अच्छें हो या बुरे
उनका होना जरुरी है
क्योंकि तभी चलता है
विकास का क्रम!

मंगलवार, ६ अक्तूबर २००९

छोटी-सी एक ग़ज़ल

घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की जगह रखना!

जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना!

मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए
अपने दिल में कहीं खुदा रखना!

मिलना-जुलना जहाँ जरुरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना!

उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना!

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