फ़ॉलोअर

13 फ़र॰ 2010

...कैसे???

टुकडों में जी जाती है जिंदगी कैसे?
ज़ख्मों की की जाती है गिनती कैसे?

मेरा हर झूठ बन जाता है सच,
इस सच पे लिखूं शायरी कैसे?

हर तरफ़ अपनों की लगी है भीड़,
इस शोर को कहूँ तन्हाई कैसे?

अन्दर कुछ,बाहर कुछ और हूँ मैं,
आईने में देखूं अपनी सच्चाई कैसे?

कहते हैं फकीरी में ताक़त गजब है,
'कायस्थ' तेरे भीतर चलाऊं सुई कैसे?

8 फ़र॰ 2010

मेरी कविता के बिखरे टुकड़े...

1.पतंग

डोर मेरे हाथ में
सरसर उड़ती पतंग,
जैसे ईश्वर और इंसान का संग।


2.पंखा

पंखा घूमें कमरे में
हवा में फैले तरंग,
जैसे कर्म भाग्य का संग।


3.शराब

तन में उतर कर शराब
तनकर बाहर आए,
जैसे सफलता इतराए।


4.अखबार

आजकल
मैं पढता नहीं अखबार,
एक ही ख़बर
बार-बार।


5. कविता

शब्दों को तोड़कर
हेर-फेर कर
जो लिख जाता हूँ
कहता हूँ, है कविता।


6.सवाल


काव्य कहाँ से प्रस्फुटित हो
हृदय में यदि रेगिस्तान बसा हो!
जठराग्नि से पीड़ित तन-मन में
और-और का शोर मचा हो!

7.पगडण्डी


सभ्यता के टुकड़े
जुड़ते सभ्यता से
पगडंडियों के द्वारा,
जैसे परमात्मा से आत्माएं...

4 फ़र॰ 2010

भोला इंसान

Neeraj Kumarसुबह रात सी काली
आसमान में खुनी लाली
खाली जूठी प्याली।

भय से फैली आँख
समाचारों की टूटती साख
मासूम सपनो की राख।

गहरी जेबों का प्रहार
रिश्तों को बेचते बाज़ार
खोखले वादों की सरकार।

शिक्षा का अभिमान
भोला बड़ा तू इंसान
व्यावहारिक नहीं तेरा ज्ञान। 

1 फ़र॰ 2010

यकीन कर लो


तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो
क्या है कहना जो छुपा रहे हो!

नज़रें ये तेरी बता रही हैं
नगमे मेरे गुनगुना रहे हो।

हाथों पे हिना जो रचा रखी है
उसपे तारे क्यूँ सजा रहे हो!

माथे पे आई लटें हटा दो
साँसों में हलचल मचा रहे हो।

वादों पे हमारे यकीन कर लो
दांतों से आँचल दबा रहे हो।