टुकडों में जी जाती है जिंदगी कैसे?
ज़ख्मों की की जाती है गिनती कैसे?
मेरा हर झूठ बन जाता है सच,
इस सच पे लिखूं शायरी कैसे?
हर तरफ़ अपनों की लगी है भीड़,
इस शोर को कहूँ तन्हाई कैसे?
अन्दर कुछ,बाहर कुछ और हूँ मैं,
आईने में देखूं अपनी सच्चाई कैसे?
कहते हैं फकीरी में ताक़त गजब है,
'कायस्थ' तेरे भीतर चलाऊं सुई कैसे?
Neeraj Kumar has been publishing blog on various topics for a long time. It started with publishing his Short Hindi Poems. Now it is time to write on wide range of subjects which affects people in a big way. Hope he can showcase real person who is emotional to the world and the humanity.
फ़ॉलोअर
13 फ़र॰ 2010
8 फ़र॰ 2010
मेरी कविता के बिखरे टुकड़े...
1.पतंग
डोर मेरे हाथ मेंसरसर उड़ती पतंग,
जैसे ईश्वर और इंसान का संग।
2.पंखा
पंखा घूमें कमरे में
हवा में फैले तरंग,
जैसे कर्म भाग्य का संग।
तनकर बाहर आए,
जैसे सफलता इतराए।
मैं पढता नहीं अखबार,
एक ही ख़बर
बार-बार।
हेर-फेर कर
जो लिख जाता हूँ
कहता हूँ, है कविता।
जैसे कर्म भाग्य का संग।
3.शराब
तन में उतर कर शराबतनकर बाहर आए,
जैसे सफलता इतराए।
4.अखबार
आजकलमैं पढता नहीं अखबार,
एक ही ख़बर
बार-बार।
5. कविता
शब्दों को तोड़करहेर-फेर कर
जो लिख जाता हूँ
कहता हूँ, है कविता।
6.सवाल
काव्य कहाँ से प्रस्फुटित हो
हृदय में यदि रेगिस्तान बसा हो!
जठराग्नि से पीड़ित तन-मन में
और-और का शोर मचा हो!
सभ्यता के टुकड़े
जुड़ते सभ्यता से
पगडंडियों के द्वारा,
जैसे परमात्मा से आत्माएं...
हृदय में यदि रेगिस्तान बसा हो!
जठराग्नि से पीड़ित तन-मन में
और-और का शोर मचा हो!
7.पगडण्डी
सभ्यता के टुकड़े
जुड़ते सभ्यता से
पगडंडियों के द्वारा,
जैसे परमात्मा से आत्माएं...

