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20 मार्च 2016

यौवन के नवरंग...

इस बरस रंगीली होली में
तन ना रंगाऊं,
मन रंगाऊं।
इस बरस उम्र की डोली में,
मैं ना
जाऊँ, ठहर ही जाऊँ।


इस बरस सखियों की ठिठोली से
मैं क्यों घबराऊँ, मैं तो
मुस्काऊँ।
इस बरस जीवन के रंगों को
मैं ना पाऊँ तो कब पाऊं।




इस बरस रति के अंगों को
मैं ना सजाऊँ तो कब सजाऊँ?
इस बरस यौवन की कलियों को
मैं ना चत्काऊँ
तो कब चत्काऊँ?


इस बरस प्रेम के सागर में
मैं ना नहाऊं, डूब ही जाऊं।
इस
बरस बदन की अग्नि को
मैं ना बुझाऊँ और भड़काऊं।




इस बरस बाबुल के आँगन को
मैं ना छोडूं तो कब छोडूं?
इस बरस
पिया के सपनों को
मैं ना
देखूं तो कब देखूं?


इस बरस साजन की बाहों में
मैं ना जाऊं
तो मर ही जाऊं।
इस बरस रंगीली
होली में
तन रंगाऊं, मन भी रंगाऊं।

4 टिप्‍पणियां:

आशुतोष दुबे 'सादिक' ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना.
हिन्दीकुंज

नीरज गोस्वामी ने कहा…

होली की रचना का प्रस्तुतीकरण भी क्या खूब रंग बिरंगा पेश किया है आपने...इस से इस की खूबसूरती में चार चाँद लग गए हैं...लेकिन ये रचना तो आठ माह बाद प्रकाशित होनी चाहिए थी...होली पर...

नीरज

shama ने कहा…

आपकी रचनाओं में एक दर्द हमेशा सिमटा -सा रहता है ...किसके रोकने से वक्त रुका है ? घडीकी सुई कब उलटी घूमी ?

ऐसी ही रचनाएँ वो गीत याद दिलाती हैं,' हैं सबसे मधुर गीत वही,जिन्हें हम दर्द के सुरमे गाते हैं...'

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विनय ‘नज़र’ ने कहा…

वाह-वा, महौल बना दिया
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तख़लीक़-ए-नज़र

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एक अदना सा आदमी हूँ और शौकिया लिखने की जुर्रत करता हूँ... कृपया मार्गदर्शन करें...