गुरुवार, ९ जुलाई २००९

...तो अच्छा है

दिमाग न ठहरे भी तो अच्छा है,
दिमाग ठहर जाए तो अच्छा है।

कुछेक दिनों से जिस भटकन में हूँ,
कोई कविता रच दूँ तो अच्छा है।

न वक्त न भावों की है किल्लत अब,
उतार दूँ कागज़ पे तो अच्छा है।

अक्षर अभी मेरे भीतर गडमड
बता सकूँ शब्दों में तो अच्छा है।

यही कविता की है 'नीरज' खूबी,
भुला कर सब सोचो तो अच्छा है।

3 Comments:

नीरज गोस्वामी said...

उनके आने से जो आजाती है हम पर रौनक
वो समझते हैं की बीमार का हाल अच्छा है

आपकी ग़ज़ल के रदीफ़ से ग़ालिब की ग़ज़ल याद आगई...बहुत अच्छी रचना...लिखते रहिये क्यूँ की....ये काम अच्छा है...
नीरज

ओम आर्य said...

bahut hi achchhi baat aapane kahi hai par kai baate aisi hoti hai ki bhulaya nahi ja pata ......fir bhi kishish ki karane ko prerit kar rahi hai apaki kawita

Anjana said...

किस भटकन की बात कर रहें हैं आप...रचना अच्छी तो है...

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