फ़ॉलोअर

28 अग॰ 2009

नज़ारें आपके हैं

हर तरफ़
सबसे आगे जाने की
दौर चल रही थी!
मैं उसमे सबसे
पीछे चल रहा था!
हर बात में
ले लिया करता था
मैं खुदा
से इजाज़त!
आज
खुदा भी हमसे
दूर हो गया था!
प्यार से जिसे
बुलाया था मैंने
आज वो भी मेरा
कोई न रहा!
आज मैं
सबसे अलग
रहना चाहता हूँ
तो बुलावा आया आपका!

24 अग॰ 2009

बस यूँ ही...


क्या तुझे है पता

मैं होने लगा हूँ एक कवि?

चल तुझे दूँ बता

जिक्र-ऐ-इश्क करूँ अब सही।



अपनी उदासी का कभी

कोई बहाना ना किया,

झूठे शब्दों का कभी

मैंने सहारा ना लिया।



अपनी शायरी का सरे-शाम

सुनाना ना किया,

तेरी अर्चना का कभी

मैंने इरादा ना किया।



फिर भी एक सच है

इश्क को दिली माना है,

काफिरों की सोहबत में भी

'नीरज' तेरा ही दीवाना है।