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17 जुल॰ 2009

जिंदगी को एक आजाद मोड़ दो...

जा रहा हूँ दूर जीवन से हार कर

रो रही है आँख तुझको पुकार कर।

मैं नहीं हैरान दस्तूर है यही

क्यों रखूँ उम्मीद सच को बिसार कर।

जिंदगी को एक आजाद मोड़ दो

जो मिले दिलदार कहना कि प्यार कर।

जिंदगी में जो मुलाकात हो कभी

फेर लेना पीठ माजी बिसार कर।

ये तिरे जज्बात जंजाल हैं बने

कर नई शुरुआत अहसास मार कर।

jhwuqbznyr

यह कैसा पुरूष...



यह कैसा पुरूष!
उसके आंखों से बह रहे आंसू
जमाने से छुपे नहीं...
उसने किया अपने अन्तर के
हाहाकार का प्रदर्शन सरेआम...
उसने हृदय के कोमलता का,
जीवन की दयनीयता का
प्रकटीकरण स्वयं किया।

यह कैसा पुरूष!
उसने नारी के कन्धों का
सहारा क्यों लिया...
सारे पुरातन पौरुष को
व्यक्तित्व की दृढ़ता को
क्यों कलंकित कर दिया?

16 जुल॰ 2009

महफ़िल में दिवाने आए हैं

दस्तूर-ऐ-इश्क निभाने आए हैं,
लो आज महफ़िल में दिवाने आए हैं।

दुल्हन बनी आप सजी हैं गहनों से,
खूने-जिगर मांग सजाने आए हैं।

जज्बात में जोश भरा था तुमने भी,
मदहोश ऐ हुस्न जगाने आए हैं।

बदनाम है प्यार जमाने में काफ़ी,
तस्वीर की ओट दिखाने आए हैं।

मंजूर है ख़त्म मुहब्बत में होना,
तारीख में नाम लिखाने आए हैं।

15 जुल॰ 2009

खिलौना ...खुदा के हाथ का

एक कतरा रौशनी की तमन्ना थी हमें
आप समझे चांदनी को चुराने आ गए।

खून अपने हाथ हमने मुहब्बत का किया,
लोग समझे खूं सभी का बहाने आ गए।

शाम हमने शायरी सुनाई शौक से,
रात सपने गालिबों के सुहाने आ गए।

अलविदा कहने गए जो पुराने दोस्त को,
आप सजने यूँ लगे के लिवाने आ गए।

हम खिलौना हो गए हैं खुदा के हाथ का,
हम नहीं है खास इतना बताने आ गए।

12 जुल॰ 2009

प्यार के तार...

Neeraj Kumar
चांदनी ओढ़ के वो गुजर जाते हैं,
होश में बाद तक हम नहीं आते हैं।

जिंदगी दिल्लगी का हुआ सामां है,
आज तारे सहर में निकल आते हैं।

आशिकी रोग है बच सकें तो अच्छे,
हाल-बेहाल यूँ बाद पछताते हैं।

जुल्म करने लगे हैं अदा से ऐसे,
घायलों को दुआ भी दिए जाते हैं।

खिड़की रौशनी का नही है रास्ता,
देख वो आँख से शे'र फरमाते हैं।

कत्ल हो और हो दर्द ना 'नीरज' तो
जान लो प्यार के तार उलझाते हैं.

11 जुल॰ 2009

टूट गई गुल्लक...

सपनों को रखता रहा था
दूसरो से छिपाकर,
आ गई क़यामत
जब
टूट गई गुल्लक...
जिंदगी बिखर गई।

10 जुल॰ 2009

आदमी का हाल...

जिंदगी की कर रहा हूँ बात मैं,
चाहता हूँ इश्क की सौगात मैं।

सोच लो ये शाम लौटे फ़िर नहीं
कर सकूँ जब प्यार की बरसात मैं।

हैं मुझे वो याद वादे आज भी
ला सका हूँ इसलिए बारात मैं।

आदमी का हाल है ऐसा हुआ,
आज हूँ खाली इसी ही रात मैं।

9 जुल॰ 2009

...तो अच्छा है

दिमाग न ठहरे भी तो अच्छा है,
दिमाग ठहर जाए तो अच्छा है।

कुछेक दिनों से जिस भटकन में हूँ,
कोई कविता रच दूँ तो अच्छा है।

न वक्त न भावों की है किल्लत अब,
उतार दूँ कागज़ पे तो अच्छा है।

अक्षर अभी मेरे भीतर गडमड
बता सकूँ शब्दों में तो अच्छा है।

यही कविता की है 'नीरज' खूबी,
भुला कर सब सोचो तो अच्छा है।

6 जुल॰ 2009

आख़िर कब तक...

जीने की अतुल इच्छा के बावजूद
स्थापित आदर्शों का पालन कर
योग्यता की असीमता के साथ
असफलता का पान कर
आख़िर
कब तक जिन्दा रहे आदमी...

5 जुल॰ 2009

मैं हूँ...

मैं हूँ

खुशियाँ हैं

खट्टा-मीठा संसार है।

मैं हूँ

जीवन है

जीवन के आदर्श हैं।

मैं हूँ

जिंदगी है

जीने की चाह है।

मैं हूँ

सफलता है

सफल होने की योग्यता है।

मैं न रहूँ

संसार नहीं

जीवन नहीं

आदर्श नहीं

योग्यता नहीं...

4 जुल॰ 2009

कविता के टुकड़े...

काव्य कहाँ से प्रस्फुटित हो
हृदय में यदि रेगिस्तान बसा हो!
जठराग्नि से पीड़ित तन-मन में
और-और का शोर मचा हो!