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26 जून 2009

पूछो ना तुम...

हाल हमारा पूछो ना तुम,
कौन हराया पूछो ना तुम।

जाग रहे थे सपनों में हम
नींद खुली कब पूछो ना तुम।

रूठ गए हैं जो जो हम से
नाम किसी का पूछो ना तुम।

किस्मत फूटी कहते हैं तो
दाम हमारा पूछो ना तुम।

हिम्मत टूटी गिरने से तो
कारण हम से पूछो ना तुम।

शाम अभी है काले बादल
आस सवेरा पूछो ना तुम।

जीवन सारा बदतर है अब
अंत हमारा पूछो ना तुम।

24 जून 2009

वादों पे हमारे यकीन कर लो...

तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो
क्या है कहना जो छुपा रहे हो!

नज़रें ये तेरी बता रही हैं
नगमे मेरे गुनगुना रहे हो।

हाथों पे हिना जो रचा रखी है
उसपे तारे क्यूँ सजा रहे हो!

माथे पे आई लटें हटा दो
साँसों में हलचल मचा रहे हो।

वादों पे हमारे यकीन कर लो
दांतों से आँचल दबा रहे हो।

23 जून 2009

जरा सोच लीजे...

काश! आप मेरे दीवाने न होते

और संग सारे बहाने न होते।

बात जो चली तो चलो मैं बता दूँ

राह में हमारे ठिकाने न होते।

रोशनी अभी तक मिली ना कहीं भी

और संग ताने पुराने न होते।

होश है हमें ना ग़मों के किसी का

रात में लबों पे तराने न होते।

हाथ में नहीं है वफ़ा की लकीरें

जोश में मुहब्बत निभाने न होते।

आज आप 'नीरज' जरा सोच लीजे

बाद में शिकायत सुहाने न होते।

प्यार का जलजला...

प्रियतम मेरा न जाने कहाँ है,
सोचता हूँ मैं वही बेवफा है।

इश्क में तेरे दिवाना हुआ मैं,
पूछता हूँ ब्रज का क्या पता है।

आखिरी लौ भी बुझा दी किसी ने,
देखता हूँ मैं अभी क्या बजा है।

आशिकी का हाल पूछा किसी ने
तो कहा ये प्यार का जलजला है।

22 जून 2009

एक परदा...

मैं हूँ खिड़की पे लटका एक परदा,
देखता हूँ सब कुछ नहीं कहता।

है क्यूँ हैरान वो यह ख़बर पढ़कर,
उसके रास्तेमें क्या गड्ढा नहीं पड़ता।

अंधे-बहरों का वक्त गुजरता है मजे से,
पड़ोस में कौन जन्मा, कौन मरा न पता।

इंसानों की बस्तियां सिमटी है ऐसे,
चाँद की ख़बर है दिल्ली का न पता।

राम तेरी दुनिया हुई है आज कैसी,
आता जाता कोई भी अंदर न झांकता।

20 जून 2009

हर इंसान सनम है...

मेरे पास वक्त बहुत कम है,
एक तेरी ही आँख नम है।
इश्क को करने दो इन्तजार,
कामयाबी बस चार कदम है।
चुभे है इतने नश्तर सीनों में,
मुहब्बत ही आज का धरम है।
मैं निकला हूँ जीतने दुनिया,
दिल में प्यार, हाथ में कलम है।
एक तेरी बाहें मुझे है नामंजूर,
मेरा तो हर इंसान सनम है।

19 जून 2009

लिखूं शायरी कैसे...

टुकडों में जी जाती है जिंदगी कैसे,
ज़ख्मों की की जाती है गिनती कैसे!

मेरा हर झूठ बन जाता है सच,
इस सच पे लिखूं शायरी कैसे!

हर तरफ़ अपनों की लगी है भीड़,
इस शोर को कहूँ तन्हाई कैसे!

अन्दर कुछ,बाहर कुछ और हूँ मैं,
आईने में देखूं अपनी सच्चाई कैसे!

कहते हैं फकीरी में ताक़त गजब है,
कायस्थ तेरे भीतर चलाऊं सुई कैसे!

प्रसून कंटक: ०७/०९/१९९३

कहीं
एक बम फटा,
दो चार आदमजात
लोथड़ों में बदल गए,
लेकिन
अनेक दिल भी फटे,
कुछ डर गए,
कुछ जल उठे।

हिंदू मरा
मुसलमान ने मारा
या
फ़िर पंजाबियों ने मारा,
सोचते हैं हिन्दुस्तानी
बम था पाकिस्तानी।

बस
अब प्रतिशोध था,
ह्रदय का क्रोध था;
मरने वाले मर गए बम-विस्फोट में,
मारने वाले मार गए बम-विस्फोट से।

देख तू
तुने ये क्या किया
तेरे रक्षा अस्त्र ने
दुनिया को त्रस्त किया।

वाह रे आविष्कारक
तुने तो आदमी को ही मार ।

ग़ज़ल...तो नहीं

जिंदगी ईंटों से बनी कोई इमारत तो नहीं!
कब्रिस्तान में लाशों को शिकायत तो नहीं?


सिकंदर बड़े-बड़े वक्त की मिट्टी में मिले,
मौत शहंशाह की भी क़यामत तो नहीं!


दाग मेरे दामन में थे पुराने कितने,
दिखाया था तुझे की, वकालत तो नहीं।


मासूमों के खून से रंगी है सरजमीं ,
शायरी है जंग मेरी, इबादत तो नहीं।


झींगुर की आवाज़ से सन्नाटा मिटे,
खुदा तेरी इतनी इनायत तो नहीं।

18 जून 2009

टेकता लाठी
एक बूढा
बढ़ रहा है
रास्ते के ठोकरों से
क़दमों को बचाते
लड़खड़ाते।


सोचते हुए-
"अब पाया लाठी
लाभ क्या?
लड़ सकता नहीं
चल भी सकता नहीं
जब
बिन सहारे।"


उसकी आँखे
खोज रही हैं
एक जवान
उत्तराधिकार सौंपने को
लाठी थमाने को।


शायद
बूढे के डगमगाते कदम
मजबूत हो जायें
मजबूत बांहों का
सहारा पाकर
कि वह
कुछ और आगे बढ़ सके
और
अपनी लाठी-
जीवन के अनुभव को
सही हाथों में
सौंप जाए।

बुदबुदा रहा है वह-
ऐ युवा!
थम ले बढ़कर
मेरी लाठी,
पा ले
बुजुर्ग जीवन की कमाई
शुभाशीष में
आज ही।

16 जून 2009

प्रसून कंटक: २४/०५/९६

मैं चाहता हूँ
मिल जाना मिट्टी में,
लेकिन आह!
मैं मिल नहीं पाता
क्यूंकि
मैं साधारण मिट्टी नहीं
एक घडा हूँ,
टूटा हुआ घडा...


इन्हें जरुर पढ़ें:

बबली : दिल-ओ-दिमाग के सुकून के लिए

दीप्ती : अच्छी कवितायें मिलेगी

विवेक : नौजवान को प्रोत्साहित करें

साथ तेरा ना होगा

जब तक तेरे घर में अँधेरा ना होगा,
मेरे मन में खुशी का बसेरा ना होगा।

शबनम को है इंतजार उस दिन का,
उसके बिना जब कोई सवेरा ना होगा।

आदमी की बढती जाती हैं हसरतें,
शायद कल से कोई फकीरा ना होगा।

ख़ुद में सिमटी जा रही हैं लड़कियां,
गली में झांकता अब मुंडेरा ना होगा।

हम ही हम होंगे साहिल पे 'कायस्थ',
सुहानी शामों में साथ तेरा ना होगा।

इन्हें अवश्य पढ़ें...
हिन्दी-युग्म : साहित्य का ज्ञान बढायें
शायरी : पसंद आएगी जरुर
अजय : पढ़ें और जाने

13 जून 2009

मैं क्या कहूँ?

पूछते हो-कैसा हूँ, मैं क्या कहूँ?

तन्हा हूँ तेरे बिन, मैं क्या कहूँ?

बिकता है प्यार भी ज़माने में,

उसपर सोचता हूँ, मैं क्या कहूँ?

मिलता हैं कई रास्ते मोड़ पे

अंत होगा कहाँ, मैं क्या कहूँ?

करता हूँ रौशनी, मरते पतंगे हैं,

अंधेरे में लेटा हूँ, मैं क्या कहूँ?

मंदिरों में इतनी हैं मूर्तियाँ,

इन्सां हूँ या 'कायस्थ', मैं क्या कहूँ?

10 जून 2009

प्रसून कंटक: ०७/१०/१९९१

स्वतंत्र हम-

भारत के जन-गण

बापू नेहरू के

भारत में जीते हैं क्या?

सत्य-अहिंसा- पंचशील

पुस्तकेषु सिद्धांत हैं।

पदवी-पैरवी में है रेस

लाठी वाले की है भैंस।

मूल्यों का कोई मूल्य नहीं

कुर्सी के सब ग्राहक हैं।

समाजवादी- समाजसेवी

जग-जाहिर रंगे सियार है।

राजनेता धर्मवक्ता

रामराज्य के प्रवक्ता हैं

पर राम राज्य का साधन है।

कौन जनता का दुःख हरता है?

इन झंझटों में कौन फंसता है।

राजनीति और धर्म-

इन दो पाटों के बीच

केवल घुन ही पिसता है।

9 जून 2009

गाँव की ओर

उन्नति की होड़ में
जाते क्यों हैं भूल,
आदम की जात है
धरती की हैं धूल।
जीवन की दौड़ में
निकालें कितनी दूर,
उम्र की ढलान पे
थकेंगे हम जरुर।
उखड़ अपनी जड़ से
फैलते चले गए,
सिमटती दुनियाँ में
ख़ुद से बिछड़ गए।
वापस लौटकर हम
चलें गाँव की ओर,
और छोड़कर अहम्
पायें माँ की गोद।